4 अगस्त, 2020|10:52|IST

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बढ़ते संकट के बीच उम्मीद की किरण

भारत में ‘न्यू नॉर्मल’ आखिर कैसा होगा? देश में कोरोना-संक्रमित मरीजों की बढ़ रही संख्या को देखकर अभी इस पर चर्चा मुफीद नहीं मानी जाएगी। हालांकि, जिस तरह से महामारी के शुरू होते ही लोगों की जान बचाने की सोच सबसे महत्वपूर्ण थी, उसी तरह अब सामाजिक ताने-बाने और अर्थव्यवस्था को बचाए रखने के लिए आगे बढ़ना भी जरूरी है। दरअसल, गलत सूचनाओं के कारण भय का माहौल बनता-बिगड़ता गया है। इसलिए, यह समझना जरूरी है कि आखिर हम जानते क्या हैं?
कोरोना वायरस ने दुनिया भर में कई लोगों को अपना शिकार बनाया है। अब तक छह लाख से अधिक मरीजों की इससे मौत हो चुकी है। मगर संक्रमण की वास्तविक संख्या ज्ञात मामलों से कहीं अधिक है, और हमारे लिए यह जानना महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसने बीमारी की मृत्यु-दर को लेकर कई गलत धारणाएं पैदा की हैं। मसलन, दिल्ली में एंटीबॉडी डाटा (यह हमें उस आबादी के बारे में बताता है, जो इस वायरस की चपेट में आई और ठीक भी हो गई) के मुताबिक, यहां के 20 से 30 लाख लोग संक्रमित हो चुके हैं। इसकी तुलना जब हम यहां ज्ञात 1.3 लाख से अधिक मामलों और चार हजार से कम मौत से करते हैं, तो अंतर हमें चौंकाता है। एंटीबॉडी डाटा के हिसाब से यहां मृत्यु-दर 0.2 प्रतिशत से भी कम है, जबकि ज्ञात मामलों के मुताबिक, करीब तीन फीसदी। साबित यह भी हो चुका है कि जब बड़े पैमाने पर जांच की जाती है, जैसे अब अमेरिका में हो रहा है, तो 99 फीसदी से अधिक मरीज ठीक हो जाते हैं।
इसी तरह, किसी इंसान के कोविड-19 से मरने का अतिरिक्त जोखिम भी किसी अन्य वजह से जान गंवाने की आशंका से कम है। जैसे, एक भारतीय नौजवान के लिए कोरोना से मरने का खतरा किसी सड़क दुर्घटना से मौत से अधिक नहीं है। वहीं, भारतीय युवती के लिए गर्भावस्था के दौरान मृत्यु की आशंका इसकी तुलना में कहीं ज्यादा है। अपने यहां किसी 70 वर्षीय बुजुर्ग पुरुष के मरने का खतरा पहले से ही पांच फीसदी या इससे अधिक होता है, जिसमें कोविड-19 सिर्फ एक फीसदी का अतिरिक्त जोखिम बढ़ा रहा है।
हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि समस्या कोई छोटी है। दूसरे शब्दों में कहें, तो महामारी के दौरान मृत्यु का वार्षिक जोखिम दोगुना हो रहा है। इसके अलावा, यह जोखिम उन लोगों में भी पसर रहा है, जो हमारे आसपास हैं। असली समस्याएं तो तब शुरू होती हैं, जब बीमारी इतनी तेजी से फैलने लगे कि वह पूरे स्वास्थ्य ढांचे को प्रभावित करना शुरू दे। तब मौतें सिर्फ महामारी की वजह से नहीं, बल्कि अन्य कारणों से भी होने लगती हैं, जिनसे सामान्य दिनों में बचा जा सकता है। लिहाजा ‘न्यू नॉर्मल’ का मकसद नागरिकों की जान की सुरक्षा होना चाहिए। इसके लिए उचित सावधानी बहुत जरूरी है, ताकि कोरोना का भयावह प्रसार न हो।
तमाम स्कूलों, कॉलेजों, रेस्तरां और मॉल आदि के खुलने के साथ जब हम सामान्य जीवन की ओर पहला कदम बढ़ाएंगे, तब कोविड-19 के मामलों में भी वृद्धि होगी और मौत का आंकड़ा भी बढ़ेगा। जब तक हमारे पास प्रभावी इलाज या टीका नहीं उपलब्ध होगा, हमें इस अप्रिय सच को स्वीकार करना ही होगा। ऐसे में, सार्वजनिक स्थानों पर मास्क का इस्तेमाल संभवत: जोखिम कम करने का सबसे महत्वपूर्ण उपाय होगा। अब तक यह साफ हो चुका है कि छींक या खांसी के दौरान मुंह से निकलने वाली बडे़ आकार की ड्रॉपेलट, यानी पानी की छोटी-छोटी बूंदों से संक्रमण फैलने की आशंका अधिक होती है, लेकिन ये बूंदें जल्द ही जमीन पर बैठ भी जाती हैं। चूंकि सामान्य बातचीत में हमारे मुंह से महीन आकार की ड्रॉपलेट निकलती हैं, जिससे संक्रमित होने की आशंका बहुत कम होती है, लेकिन ये बूंदें अपेक्षाकृत ज्यादा समय तक हवा में तैरती भी रहती हैं, जिसके कारण बंद, भीड़भाड़ और गैर-हवादार जगहों पर संक्रमण का जोखिम बढ़ सकता है। मगर मास्क पहनने से न सिर्फ ये बूंदें हवा में कम जाती हैं, बल्कि जो हमारे आसपास हैं, उन्हें भी खतरा कम होता है। ड्रॉपलेट के प्रसार को हवा में रोकने के लिए कोई भी सामान्य मास्क कारगर है, जबकि एन 95 मास्क की जरूरत उन्हें है, जो चाहते हैं कि हवा में मौजूद ड्रॉपलेट उनकी सांसों में न जाए। लिहाजा, अगर हर इंसान सामान्य मास्क भी पहनने लगे, तो एन-95 मास्क की जरूरत नहीं होगी। यह न सिर्फ संक्रमण के प्रसार को थामने की बेहतर रणनीति है, बल्कि संक्रमण की भयावहता भी कम कर सकती है, क्योंकि अधिक मात्रा में वायरस के संपर्क में आने से अधिक गंभीर बीमार पड़ने की आशंका होती है।
बचाव का एक अन्य उपाय है, बंद जगहों पर लोगों की संख्या नियंत्रित करते हुए ऐसी व्यवस्था करना कि वहां अधिक से अधिक स्वच्छ हवा आए। एकाध महीने में गरमी खत्म हो ही जाएगी, इसलिए वातानुकूलित इमारतों में तापमान से कोई समझौता किए बिना हम ताजा हवा पहुंचा सकते हैं। हालांकि, रेस्तराओं में (जहां मास्क पहनना संभव नहीं) कुछ समस्याएं आ सकती हैं, क्योंकि वे इस तरह से बनी होती हैं कि बिना आर्टिटेक्ट या इंजीनियर से उनमें बदलाव संभव नहीं। मगर, ताजा हवा न आने की सूरत में ऐसे उपाय किए जा सकते हैं कि बंद कमरे की हवा बार-बार बदलती रहे।
हमें कोविड-19 को कलंक मानने की मानसिकता से भी ऊपर उठना होगा। अधिकांश संक्रमित मरीज घर पर ही आइसोलेट होकर ठीक हो सकते हैं, और इसके लिए पड़ोसियों को घबराने की जरूरत नहीं है। रिवर्स आइसोलेशन भी एक विकल्प है, जिसमें उच्च जोखिम वाले लोग थोड़े दिनों के लिए खुद-ब-खुद अलग-थलग हो जाते हैं। वैसे, अधिकाधिक संक्रमण उम्मीद की किरण है, क्योंकि यदि हमने इसका बेहतर प्रबंधन कर लिया, तो हमारे पास ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा होगी, जिनमें इस वायरस के खिलाफ प्रतिरोधक ताकत होगी। हालांकि, यह ‘हर्ड इम्यूनिटी’ अवस्था अभी चंद कदम दूर है, लेकिन ‘लोकल इम्यूनिटी’ बड़े प्रकोप को थामने के लिए पर्याप्त हो सकती है। जाहिर है, आपदा का यह आकार हमारे लिए अब भी अवसर बन सकता है, बशर्ते ‘न्यू नॉर्मल’ के बारे में अभी से सोचा जाए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 29 july 2020